फागुन आता देखकर
उपवन हुआ निहाल,
अपने तन पर लेपता
केसर और गुलाल..
तन हो गया पलाश-सा
मन महुए का फूल,
फिर फगवा की धूम है
फिर रंगों की धूल..
मादक महुआ मंजरी
महका मंद समीर,
भँवरे झूमे फूल पर
मन हो गया अधीर..
ढोल मंजीरे बज रहे
उड़े अबीर गुलाल,
रंगों ने ऊधम किया
बहकी सबकी चाल..
कोयल कूके कान्हड़ा
भँवरे भैरव राग,
गली-गली में गूँजता
एक ताल में फाग..
नैनों की पिचकारियाँ
भावों के हैं रंग,
नटखट फागुन कर रहा
अंतरमन को तंग..
रंगों की बारिश हुई
आँधी चली गुलाल,
मन भर होली खेलिए
मन न रहे मलाल..
उजली-उजली रात में
किसने गाया फाग,
चाँद छुपाता फिर रहा
अपने तन के दाग..
नेह-आस-विश्वास से
हुए कलुष सब दूर,
भीगे तन-मन-आत्मा
होली का दस्तूर..
डॉक्टर विश्राम
सीनियर पीसीएस अधिकारी
राजस्व परिषद प्रयागराज
पूर्व उपजिलाधिकारी दुद्धी,सोनभद्र







