प्रखर राष्ट्रवादी थे डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी

महुली-सोनभद्र – कलकत्ता के प्रतिष्ठित परिवार में पैदा हुए आशुतोष मुखर्जी के पुत्र डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे।1917 में मैट्रिक व 1921 में बीए प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर 1923 में लॉ की उपाधि प्राप्त किए और उसके बाद इंग्लैंड चले गए ।1926 में बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे।अपने पिता का अनुसरण करते हुए अल्पायु में ही उन्होंने विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएं प्राप्त की ।33 वर्ष की आयु में ही वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बने।एक विचारक तथा प्रखर शिक्षाविद के रूप में उनकी उपलब्धि तथा ख्याति निरन्तर आगे बढ़ती रही।उक्त बातें भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता डीसीएफ चेयरमैन सुरेन्द्र अग्रहरि ने महुली लैम्पस पर आयोजित डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के बलिदान दिवस के अवसर पर कही।उन्होंने कहा कि डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्वेच्छा से अलख जगाने के लिए राजनीति में प्रवेश किया।वे सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक व सिद्धांतवादी थे।उन्होंने बहुत से गैर कांग्रेसी हिंदुओं की मदद से कृषक प्रजा पार्टी से मिलकर प्रगतिशील गठबंधन का निर्माण किया।इस सरकार में वे वित्त मंत्री बने ।इसी समय वे सावरकर के राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित हुए और हिन्दू महासभा में सम्मिलित हुए।मुस्लिम लीग की राजनीति में बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था।

वहाँ साम्प्रदायिक विभाजन की नौबत आ रही थी।साम्प्रदायिक लोगो को ब्रिटिश सरकार प्रोत्साहित कर रही थी ।ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्होंने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओ की उपेक्षा न हो।अपनी विशिष्ट राजनीति से उन्होंने बंगाल के विभाजन के मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया।1942 में ब्रिटिश सरकार ने विभिन्न राजनैतिक दलों के छोटे बड़े सभी नेताओं को जेल में डाल दिया।डॉ मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक है ।इसलिए धर्म के आधार पर विभाजन के कट्टर विरोधी थे।वे मानते थे कि विभाजन संबंधी उत्पन्न हुईं परिस्थिति ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से थी। डॉ साहब के विचारों को अन्य राजनीतिक दलों के तत्कालीन नेताओं ने अन्यथा रूप से प्रचारित प्रसारित किया, बावजूद इसके लोगो के दिलो में उनके प्रति अथाह प्यार और समर्थन बढ़ता गया ।अगस्त 1946 में मुस्लिम लीग ने जंग की राह पकड़ ली और कलकत्ता में भयंकर बर्बरतापूर्ण अमानवीय मारकाट हुई।उस समय कांग्रेस का नेतृत्व सामुहिक रूप से आतंकित था।ब्रिटिश सरकार की भारत विभाजन की गुप्त योजना और षडयंत्र को कांग्रेस के नेताओ ने अखण्ड भारत संबंधी अपने वादों को ताक पर रखकर स्वीकार कर लिया।उस समय डॉ मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की माँग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खंडित भारत के लिए बचा लिया।


गांधी जी व सरदार पटेल के अनुरोध पर वे भारत के पहले मंत्रिमंडल में शामिल हुए।उन्हें उद्योग एवं वाणिज्य विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई।संविधान सभा और प्रांतीय संसद के सदस्य और केंद्रीय मंत्री के नाते उन्होंने शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया किन्तु उनके राष्ट्रवादी चिन्तन के चलते अन्य नेताओं से मतभेद बराबर बने रहे ,फलस्वरूप राष्ट्रीय हितों की प्रतिबद्धता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानने के कारण उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया ।उन्होंने एक नई पार्टी बनाई जो उस समय विरोधी पक्ष के रूप में सबसे बड़ा दल था। उन्होंने अक्टूबर 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की।।डॉ मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पुर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे ,उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झंडा और अलग निशान था ।वहाँ का मुख्यमंत्री (वजीरे आजम) प्रधानमंत्री कहलाता था।संसद में अपने भाषण में डॉ मुखर्जी ने धारा 370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की ।अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपना जीवन बलिदान कर दूँगा, उन्होंने तत्कालीन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ निश्चय पर अटल रहे।अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वे 1953 में बिना परमिट के जम्मू कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े।वहाँ पहुँचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और नजर बन्द कर दिया गया।23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। अग्रहरि ने कहा कि आज भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 और अनुच्छेद 35 ए समाप्त कर वहाँ पर चल रहे दो प्रधान, दो विधान व दो निशान की परंपरा को समाप्त कर पूरे देश में एक प्रधान, एक विधान और एक निशान की माँग को पूरा कर डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी जी को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित किया है ।

उनके पुण्यतिथि पर हमसभी भारतवासी उनको शत शत नमन करते हैं।।इस अवसर पर पंकज गोस्वामी, राकेश गुप्ता, धनंजय रावत,हर्ष कुमार मिश्रा, कामेश्वर प्रजापति, डॉ प्रदीप कन्नौजिया, दयाशंकर सोनी, सूर्यप्रकाश कन्नौजिया, संतोष कन्नौजिया, अनूप जायसवाल, देवकुमार गुप्ता, सुधीर कुमार उपस्थित रहे।